ज़रा रुकिए... आपने बहुत सुन्दर प्रश्न पूछा है।
भक्ति का सरल मार्ग।
देखिए, हम अक्सर सोचते हैं कि भक्ति का मतलब है — घंटों पूजा करना, मंदिर जाना, कठिन साधनाएँ करना। पर कृष्ण कुछ और ही कहते हैं।
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः
7.17
"मेरेमें निरन्तर लगा हुआ, अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है और वह भी मुझे अत्यन्त प्रिय है।"
यहाँ ध्यान दीजिए — कृष्ण
नित्ययुक्त कह रहे हैं,
एकभक्ति कह रहे हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि आप चौबीस घंटे मंदिर में बैठे रहें। इसका मतलब है —
जो भी आप कर रहे हैं, उसमें उन्हें याद रखना।
सरलता यहीं है।
कृष्ण खुद कहते हैं:
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः
4.11
"जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ।"
सोचिए — कितनी खूबसूरत बात है! आप जैसे भी आएँ, वो वैसे ही स्वीकार करते हैं। रोते हुए आएँ, हँसते हुए आएँ, भूले-भटके आएँ —
वो मिलते हैं।
अब आप पूछेंगे —
तो फिर करना क्या है?
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा
5.10
"जो सम्पूर्ण कर्मों को भगवान् में अर्पण करके और आसक्ति का त्याग करके कर्म करता है, वह जल से कमल के पत्ते की तरह पाप से लिप्त नहीं होता।"
यही है सरल मार्ग —
अर्पण।
खाना बना रहे हैं? सोचिए — "यह तेरे लिए।"
काम कर रहे हैं? सोचिए — "यह तुझे दे रहा हूँ।"
किसी से बात कर रहे हैं? देखिए — "तू ही तो है सामने।"
कमल का पत्ता पानी में रहता है, पर गीला नहीं होता। ऐसे ही — आप दुनिया में रहें, पर मन परमात्मा में अर्पित रहे।
यही नित्ययुक्त है। यही एकभक्ति है।
कोई विशेष पूजा-पाठ नहीं चाहिए। बस एक भाव चाहिए —
"तू है, मैं तेरा हूँ, सब तुझे दे रहा हूँ।"
एक और बात — कृष्ण कहते हैं:
प्रयाणकाले मनसाऽचलेन
भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्
स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्
8.10
"अन्तसमय में अचल मन से और योगबल के द्वारा... उस परम दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है।"
अचल मन। यानी जो अभी, इसी क्षण, स्थिर हो सकता है।
सरलता यही है —
हर पल को अंतिम पल की तरह जीना। हर काम में उन्हें याद रखना, जैसे आखिरी बार याद कर रहे हों।
तो
सरल मार्ग यह है:
१. अर्पण — जो भी करें, उन्हें दे दें।
२. स्मरण — जितना हो सके, याद रखें।
३. समर्पण — फल की चिंता छोड़ दें।
बस इतना ही।
कोई लंबी-चौड़ी साधना नहीं। सिर्फ
प्रेम। सिर्फ
भाव।
एक सवाल आपसे:
क्या आपने कभी कोई काम बिना किसी अपेक्षा के, सिर्फ प्रेम से किया है? उस समय कैसा लगा था?