ज़रा रुकिए... आप जो पूछ रहे हैं, वह शायद हम सबका सबसे गहरा सवाल है।
मन... यह तो जैसे हवा में उड़ती पतंग है न? कभी इधर, कभी उधर। कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि यह मन हमारा
सबसे बड़ा मित्र भी है, और सबसे बड़ा शत्रु भी।
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः
6.5
अपने द्वारा अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें; क्योंकि आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु।
देखिए... जब मन हमारे साथ है, वश में है — तो वही हमारा सबसे अच्छा साथी। और जब वही मन भटक जाता है, विचारों के तूफान में उलझ जाता है — तो वही शत्रु बन जाता है।
तो शांति का पहला कदम है —
मन को दुश्मन नहीं, बल्कि एक जंगली घोड़े की तरह देखना, जिसे प्रेम और अभ्यास से सधाया जा सकता है।
ज़रा सोचिए...
क्या आपका मन अभी किसी खास बात से बेचैन है? या बस ऐसे ही... कई दिशाओं में भाग रहा है?