A seeker asked —
Apni behen se ladne ki uttejna kyun aati hai?
भाई-बहन के बीच कलह का मूल भगवद्गीता में स्पष्ट है। तीसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं "काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः" — काम और क्रोध दोनों रजोगुण से उत्पन्न होते हैं। तुम्हारी बहन से लड़ने की उत्तेजना यह क्रोध ही है जो मन में अचानक उठता है।
पर इसकी जड़ कहाँ है? दूसरे अध्याय में कृष्ण समझाते हैं कि "ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते।" जब मन किसी विषय पर बार-बार जाता है तो आसक्ति बनती है। आसक्ति से इच्छा जन्म लेती है। जब वह इच्छा पूरी नहीं होती तो क्रोध आता है।
तुम्हारी बहन शायद तुम्हारी अपेक्षा के अनुसार व्यवहार नहीं करती। शायद उसकी आदतें तुम्हें खटकती हैं। शायद तुम चाहते हो कि वह अलग तरीके से बोले या करे। यह इच्छा ही तुम्हें बाँधती है और जब वह पूरी नहीं होती तो उत्तेजना क्रोध बनकर फूटती है।
तीसरे अध्याय में कृष्ण आगे चेतावनी देते हैं "क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति।" क्रोध से मोह उत्पन्न होता है, मोह से स्मृति भ्रमित होती है, स्मृति के नष्ट होने पर बुद्धि नष्ट होती है और बुद्धि के नष्ट होने पर मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।
छठे अध्याय में मन को वश में करने का मार्ग बताया गया है। "अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते" — अभ्यास और वैराग्य से मन को साधा जाता है। जब बहन कुछ कहे या करे जो तुम्हें अच्छा न लगे तो उस क्षण साक्षी बनकर अपने मन को देखो। उत्तेजना को पहचानो उसके उठते ही। उसे बोलने से पहले रोको।
यह भी समझो कि वह तुम्हारी बहन है पर तुम दोनों अलग-अलग स्वभाव और संस्कारों से बने हो। सोलहवें अध्याय में दैवी और आसुरी सम्पदा का वर्णन है। क्रोध और अहंकार आसुरी सम्पदा में गिने जाते हैं। यदि तुम अपने भीतर शान्ति और क्षमा विकसित करोगे तो वह दैवी सम्पदा बनेगी।
पाँचवें अध्याय में कर्मयोग सिखाया गया है। तुम्हारा कर्म है अपने परिवार में प्रेम और सद्भाव बनाए रखना। यह तुम्हारा अधिकार है कि तुम अपने व्यवहार को संयमित रखो। बहन के व्यवहार पर तुम्हारा अधिकार नहीं। "कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन" — यह सूत्र यहाँ भी लागू होता है।
जब अगली बार उत्तेजना उठे तो गहरी साँस लो और मन में दोहराओ "यह क्रोध मेरा शत्रु है मेरा स्वभाव नहीं।" कृष्ण ने तीसरे अध्याय में कहा है कि क्रोध को महापापी और महाशत्रु समझो। इसे जीतना ही असली विजय है।