A seeker asked —
Mann ashant kyun hota hai?
मन अशांत क्यों होता है इसका मूल कारण गीता में बहुत स्पष्ट रूप से बताया गया है। जब मनुष्य इन्द्रियों के विषयों में चिंतन करता है तो उनमें संगति उत्पन्न होती है। इस संगति से कामना जन्म लेती है और कामना से क्रोध पैदा होता है। क्रोध से सम्मोह उत्पन्न होता है और सम्मोह से स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति नष्ट होने पर बुद्धि का नाश हो जाता है और बुद्धि के नष्ट होने से मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।
यह मन की अशांति की पूरी यात्रा है। विषयों का चिंतन ही प्रारंभ है। जब तुम बार बार किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में सोचते रहते हो तो धीरे धीरे उसमें आसक्ति बन जाती है। फिर उसे पाने की इच्छा प्रबल होती है। यदि वह मिल जाए तो क्षणिक सुख, न मिले तो क्रोध और जलन। यह क्रोध विवेक को ढक लेता है और तुम्हें भटका देता है।
गीता में भगवान कहते हैं कि काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्। यह काम ही क्रोध है जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह महान पापी और महान भक्षक है। इसे ही शत्रु जानो।
मन स्वभाव से चंचल है। तुम स्वयं अनुभव करते हो कि इसे एक जगह स्थिर रखना कितना कठिन है। लेकिन अभ्यास और वैराग्य से इसे वश में किया जा सकता है। अभ्यास का अर्थ है बार बार प्रयत्न करना और वैराग्य का अर्थ है विषयों से मोह न रखना। जब तुम भीतर की शांति को खोजना शुरू करते हो और बाहरी चीजों में सुख ढूंढना बंद कर देते हो तो मन धीरे धीरे शांत होने लगता है।