स्वधर्म — यह सिर्फ कोई नियम या परंपरा नहीं है। यह वह रास्ता है जो
तुम्हारी प्रकृति ने तुम्हारे लिए बनाया है, वह काम जो तुम्हारे स्वभाव से, तुम्हारे गुणों से, तुम्हारी परिस्थिति से निकलता है।
जब अर्जुन युद्धभूमि में खड़े होकर कहते हैं —
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा
1.32
"मुझे न विजय चाहिए, न राज्य, न सुख। राज्य से क्या फायदा? भोग से क्या? जीवन से भी क्या?"
तो यह सुनने में बहुत ऊँचा त्याग लगता है, है ना? लेकिन कृष्ण क्या कहते हैं? वे कहते हैं:
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते
2.31
"अपने स्वधर्म को देखकर भी तू विचलित मत हो। क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है।"
यहाँ देखिये क्या हो रहा है। अर्जुन
युद्ध से भाग रहे हैं — लेकिन वे इसे त्याग कहकर सजा रहे हैं। करुणा, अहिंसा, वैराग्य के नाम पर। पर कृष्ण उनकी
असलियत पकड़ लेते हैं। यह त्याग नहीं,
कमज़ोरी है। यह करुणा नहीं,
भ्रम है।
स्वधर्म का मतलब है:
तुम जो हो, उसके अनुसार जीना। परधर्म का मतलब है:
किसी और की नकल करना, चाहे वह कितना भी ऊँचा क्यों न लगे।
स्वधर्म तीन चीज़ों से बनता है:
1.
तुम्हारी प्रकृति — तुम्हारे गुण, तुम्हारा स्वभाव। कोई जन्म से शिक्षक है, कोई योद्धा, कोई व्यापारी, कोई सेवक। यह कोई जाति-व्यवस्था नहीं — यह
मनोविज्ञान है।
2.
तुम्हारी परिस्थिति — तुम किस समय में, किस जगह पर, किस रिश्ते में हो। एक माँ का धर्म अलग है, एक बेटे का अलग, एक शिक्षक का अलग।
3.
तुम्हारा विवेक — परिस्थिति और प्रकृति को समझकर यह जानना कि
अभी, यहाँ, क्या सही है।
असली सवाल यह नहीं कि स्वधर्म क्या है। असली सवाल यह है: तुम उससे भाग क्यों रहे हो?
अर्जुन क्षत्रिय हैं। उनका काम है
न्याय के लिए लड़ना, अधर्म के खिलाफ खड़ा होना। लेकिन वे क्या कर रहे हैं? संन्यासी बनने की बात कर रहे हैं। भीख माँगकर खाने की बात कर रहे हैं।
यह वैसा ही है जैसे एक डॉक्टर ऑपरेशन थियेटर में खड़ा होकर कहे — "मैं किसी को चीर नहीं सकता, यह हिंसा है।" लेकिन वह
उसका धर्म है! उसका चाकू चलाना
करुणा है, भागना कायरता।
कृष्ण अर्जुन को यही समझा रहे हैं:
तुम्हारा धर्म वह नहीं जो सुनने में अच्छा लगे। तुम्हारा धर्म वह है जो तुम्हारी सच्चाई है।
लेकिन ध्यान दो — स्वधर्म का मतलब यह नहीं कि तुम बस जो हो वही रहो। स्वधर्म
ईमानदारी माँगता है। अगर तुम योद्धा हो, तो योद्धा की तरह जीओ — लेकिन
बिना क्रोध के। अगर शिक्षक हो, तो पढ़ाओ — लेकिन
बिना अहंकार के।
यह तुम्हें तुम्हारी जगह पर रखता है, लेकिन तुम्हें
छोटा नहीं बनाता। यह कहता है: जहाँ खड़े हो, वहीं से
विकास करो, भागो मत।
क्या यह समझ में आ रहा है? या कोई और परत खोलूँ?